Tuesday, October 26, 2010

उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तराञ्चल),























उत्तराखण्ड (पूर्व नाम उत्तराञ्चल), उत्तर
भारत में स्थित एक राज्य है जिसका निर्माण नवंबर २००० को कई वर्षों के
आन्दोलन के पश्चात भारत गणराज्य के सत्ताइसवें राज्य के रूप में किया गया
था। सन २०००२००६ तक यह उत्तराञ्चल के नाम से जाना जाता था। जनवरी २००७ में
स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए राज्य का आधिकारिक नाम
...बदलकर उत्तराखण्ड कर दिया गया। राज्य की सीमाएँ उत्तर में तिब्बत और पूर्व
में नेपाल से लगी हैं। पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण में उत्तर
प्रदेश इसकी सीमा से लगे राज्य हैं। सन २००० में अपने गठन से पूर्व यह
उत्तर प्रदेश का एक भाग था। पारम्परिक हिन्दू ग्रन्थों और प्राचीन साहित्य
में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखण्ड के रूप में किया गया है। हिन्दी और
संस्कृत गंगा और यमुना के उद्गम स्थल क्रमशः गंगोत्री और यमुनोत्री तथा
इनके तटों पर बसे वैदिक संस्कृति के कई महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं। से में उत्तराखण्ड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है। राज्य में हिन्दू धर्म की पवित्रतम और भारत की सबसे बड़ी नदियों

देहरादून, उत्तराखण्ड की अन्तरिम राजधानी होने के साथ इस राज्य का सबसे बड़ा नगर है। गैरसैण
नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते हुए भविष्य की
राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के
अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थाई राजधानी बना हुआ है। राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है।
राज्य सरकार ने हाल ही में हस्तशिल्प और हथकरघा उद्योगों को
बढ़ावा देने के लिये कुछ पहल की हैं। साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार
तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए आकर्षक कर
योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य में कुछ विवादास्पद किन्तु वृहत बांध
परियोजनाएँ भी हैं जिनकी पूरे देश में कई बार आलोचनायें भी की जाती रही
हैं, जिनमें विशेष है भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बाँध
परियोजना। इस परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गई थी और यह अन्ततः २००७ में
बनकर तैयार हुआ। उत्तराखण्ड, चिपको आन्दोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना
जाता है।

Friday, October 8, 2010

उत्तराखंड मा टिहेरी गढ़वाल जय चक्रबंदनी जोग माया खप्परभरनी


जय चक्रबंदनी जोग माया खप्परभरनी

जय चक्रबंदनी जोग माया खप्परभरनी
तू ही चामुंडा शैलपुत्री नंदा इंगला पिंगला दैत्याधाविनी
महानारी चंद्रघंटिका महाकालरात्रि कालीमाता
जब देवतों को अत्यचार हुए तब त्येर माता को जन्म हुए
राज राजेश्वरी गोरजा भवानी चमन्कोट चामुंडा
श्री शक्लेश्वर कार्तिकेय श्री देवी दैन्य संघारे
श्री गणेशाय नमः जाए नमः उद्हारिणी पिंगला महेश्वरी
महेश्वरी दैत्यधाऊ गेमन मिचाऊ तब त्वे देवी कै जाप सुनाऊ
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
जय बोला तेरी जय बोला
जय बोला तेरी जय बोला
बल गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
बेली बधान माता बल तेरा मैती होला
बेली बधान माता बल तेरा मैती होला
मल बधान जालू माँ नंदा जी को डोला
शिव कैलाश जालू माँ नंदा जी का डोला
सिद्धपीठ नौटी से चले राज जात
त्येर मैतार नौटी से चले राज जात
नन्द केसरी में हौला गढ़ कुमो का साथ
नन्द केसरी में हौला गढ़ कुमो का साथ
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
वर्षा पुजा हूनी वैदिनी का ताल
वर्षा पुजा हूनी वैदिनी का ताल
देख तेरा हाथून हवे राज्ञसू को काल
देख तेरा हाथून हवे राज्ञसू को काल
बारहू साल में त्येर चौसीघा हवे खांडू
बारहू साल में त्येर चौसीघा हवे खांडू
बान गो माँ भाई त्येरु देवता रे दुलातु
बान गो माँ भाई त्येरु देवता रे दुलातु
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
रजा कनकपाल न चंदपुरान बती
रजा कनकपाल न चंदपुरान बती
कन्नोज का राजा छाणी दैज देन भेटी
कन्नोज का राजा छाणी दैज देन भेटी
१ बार ऊ भी बल माला खून ग्येन
१ बार ऊ भी बल माला खून ग्येन
अरे येन भग्यान हवेन नि घर बोडी एइन
अरे येन भग्यान हवेन नि घर बोडी एइन
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
अध बाटा मलानी कुपुत्र हून ल्हेगे
अध बाटा मलानी कुपुत्र हून ल्हेगे
नर संहार ह्वेगे माता कुचील हवे गे
नर संहार ह्वेगे माता कुचील हवे गे
तब से नार का कालू न बनी रूप कुंद
तब से नार का कालू न बनी रूप कुंद
माँ कु श्राप ल्हेगे बची अस्थि और मुंड
माँ कु श्राप ल्हेगे बची अस्थि और मुंड
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
भद्रेस्वर निस्मा चा कडू रो को धाम
भद्रेस्वर निस्मा चा कडू रो को धाम
६ मेहना बवून ६ दसौली का नाम
६ मेहना बवून ६ दसौली का नाम
पडो हो नंदा कु बल पैलू कुल सारी माँ
पडो हो नंदा कु बल पैलू कुल सारी माँ
जख बिराज मान चा भगवती काली माँ
जख बिराज मान चा भगवती काली माँ
जय हो नंदा देवी तेरी जय बोला
गढ़ कुमो की माता मेरी जय बोला
रूप कुंद पित्रू तर्पण दिए जांदु
रूप कुंद पित्रू तर्पण दिए जांदु
होम कुंद खाडू चौसिंघ पूजी जांदु
होम कुंद खाडू चौसिंघ पूजी जांदु
माता ९ दुर्गा की पुनि आरती पूजा देना
कैलाश की और चौसिंघ पाठी देना

Sunday, October 3, 2010

उत्तराखंड में बस सेवाएं स्थगित


गढ़वाल मोटर आनर्स यूनियन ने अपनी बस सेवा बरसात खत्म होने तक स्थगित कर दी है।

उत्तराखंड में पिछले पांच दशकों में सर्वाधिक वर्षा से हो रहे भूस्खलनों से अधिकांश मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए है।

मार्ग ट्रटने के कारण गढ़वाल मण्डल में हजारों बसों का संचालन करने वाली गढ़वाल मोटर आनर्स यूनियन (जीएमओयू) ने अपनी बस सेवा बरसात खत्म होने तक स्थगित कर दी है। जिससे पहाड़ों में जीवन की गति थम सी गयी है। जीएमओयू ने यह निर्णय यात्रियों की सुरक्षा तथा सुविधा के तहत लिया है।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक जीएमओयू ने आपदा से बचने के लिए बस सेवाएं बंद कर दी है। यूनियन के अधिकारियों के अनुसार सड़कें क्षतिग्रस्त होने से यात्रियों को जगह जगह पर दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

बसों का संचालन बन्द हो जाने से गढ़वाल के पौडी, चमोली और रूद्रप्रयाग जिलों में यातायात व्यवस्था पूरी तरह और टिहरी, उत्तरकाशी और देहरादून में आंशिक रूप से ठप्प हो गयी है।

Thursday, September 30, 2010

राम मंदिर


टीवी चैनल के कर्मचारी ने
अपने प्रबंध निदेशक से पूछा
‘सर, आपका क्या विचार है
अयोध्या में राम जन्म भूमि पर
मंदिर बन पायेगा
यह मसला कभी सुलझ पायेगा।’
सुनकर प्रबंध निदेशक ने कहा
‘अपनी खोपड़ी पर ज्यादा जोर न डालो
जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बनेगा,
तभी तक अपने चैनल का तंबू बिना मेहनत के तनेगा,
बहस में ढेर सारा समय पास हो जाता है,
जब खामोशी हो तब भी
सुरक्षा में सेंध के नाम पर
सनसनी का प्रसंग सामने आता है,
अपना राम जी से इतना ही नाता है,
नाम लेने से फायदे ही फायदे हैं
यह समझ में आता है,
अपना चैनल जब भी राम का नाम लेता है
विज्ञापन भगवान छप्पड़ फाड़ कर देता है,
अगर बन जायेगा
तो फिर ऐसा मुद्दा हाथ नहीं आयेगा
कभी हम किसी राम मंदिर नहीं गये
पर राम का नाम लेना अब बहुत भाता है,
क्योंकि तब चैनल सफलता की सीढ़िया चढ़ जाता है,
इसलिये तुम भी राम राम जपते रहो,
इस नौकरी में अपनी रोटी तपते रहो,
अयोध्या में राम मंदिर बन जायेगा
तो उनके भक्तों का ध्यान वहीं होगा
तब हमारा चैनल ज़मीन पर गिर जायेगा।

Wednesday, September 8, 2010

उत्तराखण्ड में आस्था और विश्वास के साथ मनाए जाने वाले नंदा देवी मेला महोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं।


मेले की तैयारी में सामाजिक और धार्मिक संगठनों सहित प्रशासन जोर-शोर से जुटा हुआ है।
एक सप्ताह तक चलने वाला यह महोत्सव 12 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर को डोला भ्रमण के साथ संपन्न होगा ।
नैनीताल के जिलाधिकारी शैलेश बगौली ने बताया कि महोत्सव की तैयारियां जारी हैं। जिले के उप जिलाधिकारी अपने-अपने क्षेत्रों में चल रही तैयारियों का जायजा लेंगे।
अल्मोड़ा के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सीडी पंत ने बताया कि मेले में जुटने वाली भारी भीड़ के मद्देनजर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। उन्होंने बताया कि मेला स्थल के पास पुलिस नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया है।
पंत ने बताया कि अल्मोड़ा स्थित नंदा देवी मंदिर में मेले की शुरुआत राजा बाज बहादुर चंद (सन् 1638-78) के शासन काल से हुई थी और यह चंद वंश की परम्पराओं से संबंध रखता है।
पंत ने बताया कि नंदा-सुनंदा की मूर्तिं कदली वृक्ष के स्तम्भ से बनती है और पुरानी परम्पराओं के अनुसार नंदा-सुनंदा की पूजा के लिए काशीपुर के राजा अभी भी आकर पूजा की शुरुआत करते हैं।
उन्होंने बताया कि लगभग 80-90 टोलियां आकर यहां सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश करती हैं। यहां की जगरिए और बैरियों की गायकी भी काफी प्रसिद् है।
मां नंदा की पूजा पूरे हिमालय क्षेत्र में होती है, लेकिन उत्तराखण्ड, खासतौर से कुमाऊं में इस मेले की बात कुछ अलग ही है। कुमाऊं की संस्कृति समझने के लिए यह मेला सबसे उपयुक्त पाठशाला हैं।
मां नंदा के सम्मान में कुमाऊं और गढ़वाल में अनेक स्थानों पर मेले लगते हैं। पर्वतवासी देवी नंदा को अपनी बहन-बेटी मानते आए हैं। नंदा की उपासना के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों में भी मिलते हैं।
नंदा को नवदुर्गाओं में से एक माना जाता है। मेले की गतिविधि पंचमी से ही प्रारम्भ हो जाती है।
नैनीताल का प्रसिद् नंदा देवी मेला महोत्सव 12 सितंबर से शुरू होकर 19 सितंबर तक डोला भ्रमण के साथ संपन्न होगा। मेले का उद्घाटन 12 सितंबर को होगा। जिलाधिकारी 10 सितंबर को मेला क्षेत्र की व्यवस्थाओं का जायजा लेंगे ।
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उत्तराखंड गढ़वाली बोली के प्रचार-प्रसार के लिए साहित्य अकादमी ने पौड़ी में एक सम्मेलन आयोजित किया।



सम्मेलन में गढ़वाली बोली के व्याकरण,विकास और संवर्धन पर विस्तार से चर्चा हुई।
रोज़गार की तलाश में पहाड़ का युवा लगातार दूसरे राज्यों का रुख कर रहा है,जिसका असर यहां की परंपराओं और भाषा पर भी पड़ा है। विस्थापन के दर्द के बीच पहाड़ की भाषा खत्म ना हो जाए इस चिंतन के साथ साहित्य अकादमी ने पौड़ी में एक सम्मेलन का आयोजन किया।
इस सम्मेलन में मुख्य अतिथि रहे गढ़वाल के सांसद श्री सतपाल महाराज ने कहा कि अब कोशिश गढ़वाली और कुमाऊंनी भाषा को आठवीं अनुसूची में दर्ज़ करवाने की है।

पहाड़ी संस्कृति और भाषा के स्वरुप में लगातार बदलाव आता जा रहा है। ऐसे दौर में भाषाई संरक्षण के लिए की गई साहित्य अकादमी की ये पहल वाकई सराहनीय है।

Thursday, September 2, 2010

कृष्ण जैसे स्वर होठो से बरस जाते हैं ।


अश्रु के ये मोती लिए तेरा इंतज़ार करती हूँ
वृन्दावन के ग्वाले मैं तुझे प्यार करती हूँ

मन हरने वाले तुने प्राण क्यों ना हर लिए
अब दुःख होता हैं तेरी याद में राधा क्यों जिए

मथुरा क्या गया अपनी राधा को भूल गया हैं
तुझे पाने का अब राधा का सपना टूट गया हैं

सोने के महल तुझे तो लगता हैं भा गए
झाड़ वृन्दावन के मुझे रास गए

हजारो रानियाँ तू समुन्द्र से भी घेर लाया था
ढाई कोस दूर की राधा को ना देख पाया था

राधा ने तो अपना सर्वस्व तुझ पर छोड़ दिया था
अपनी हर मंजिल का रास्ता तुझ तक मोड़ दिया था

मेरे कृष्ण तेरे दर्शन की मै सदा प्यासी हूँ
विरह से उपजी प्यास बस आंसुओ से बुझाती हूँ

नटखट कान्हा तुझे मैंने किस घडी वर लिया था
क्यों एक छिछोरे में अपना मन धर लिया था

अगर मैं रूठ गयी तो तेरी बंसी की तान बिगड़ जाएगी
राजकुमारिया भले तुझे मिल जाये पर ये ग्वालिन बिछड़ जाएगी

राधा राधा बस इतने शब्द तेरे सुनने को मेरे कान तरस जाते हैं
मेरे कृष्ण मेरे कृष्ण जैसे स्वर होठो से बरस जाते हैं

Monday, August 30, 2010

भारी वष्रा से छलकने लगा टिहरी बांध

देहरादून 21 अगस्त.भाषा. उत्तराखण्ड में हो रही भारी वष्रा के चलते नदिायों का जलस्तर बढ़ने के कारण टिहरी बांध लबालब भरने लगा है । बांध ने अब तक का सबसे अधिक बिजली उत्पादन का रिकार्ड भी कायम कर लिया है ।

टिहरी जल विद्युत विकास निगम : टीएचडीसी : के आला अधिकारी के अनुसार एशिया का यह सबसे बड़े कृत्रिम जलाशय का जल स्तर पर्याप्त पानी आने से 816.5 मीटर से उपर चला गया है । और इसकी 820 मीटर तक भरे जाने की सीमा जल्दी ही आने वाली है ।

अधिकारी के अनुसार राज्य सरकार से इसकी अधिकतम जल भराव क्षमता 830 मीटर तक की अनुमति ने मिलने क कारण बांध से प्रतदिन 200 क्यूमेक्स पानी छोड़ा जा रहा है । गंगा में इतना अतिरिक्त पानी छोड़ने से मैदानी इलाकों मे बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है ।

टीएचडीसी के उक्त प्रवक्ता के अनुसार इन दिनों बांध को लगभग 600 क्यूमेक्स पानी भागीरथी से तथा 400 क्यूमेक्स भिलंगना से मिल रहा है । काफी पानी मिल जाने से इन दिनों चारों टरबाइनें चलाई जा रही हैं।

इससे स्थापित क्षमता 1000 मेगावाट से अधिक 1060 मेगावाट का बिजली उत्पादन हो रहा है । गत दिन चारों मशीनों से 24.95 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन हुआ ् जो कि एक रिकार्ड है । चारों टरबाइनें चलाने से 500 क्यूमेक्स पानी नदी में छूट रहा है तथा इसके अलावा 200 क्यूमेक्स पानी व्यर्थ ही छोड़ना पड़ रहा है ।

Wednesday, August 25, 2010

लक्ष्मी महायज्ञ आज से, कलश यात्रा निकली

बखरी (बेगूसराय) मंगलवार से बखरी में पहली बार आयोजित हो रहे श्री महालक्ष्मी महायज्ञ को लेकर सोमवार को 108 सौभाग्यवती महिलाओं द्वारा भव्य कलश यात्रा निकाली गयी। कलश यात्रा आयोजक श्री ऊं श्याम हनुमान मंदिर से निकलकर सम्पूर्ण बाजार की सड़कों से गुजर का यज्ञ स्थल पर पहुंची। यात्रा का नेतृत्व देवराहा बाबा दिव्य फाउंडेशन वृन्दावन के छोटे सरकार, यज्ञ के संयोजक नन्दलाल खेतान, कैलाश शर्मा, कार्यालय प्रमुख भोला चौधरी आदि कर रहे थे। इस मौके से कई आकर्षक झांकियां भी निकाली गयी। बताते चलें कि देवराहा बाबा दिव्य फाउंडेशन के द्वारा सम्पूर्ण भारत में पांच स्थानों पर महालक्ष्मी महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। जिसकी शुरूआत बिहार में पहली बार बखरी से की जा रही है।

Wednesday, August 18, 2010

बर्बाद हो रही खेती

farming‘भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ की 70 प्रतिशत जनसंख्या खेती पर आश्रित है,’’ यह वाक्य हम कक्षा दो से पढ़ते आये हैं। लेकिन उत्तराखण्ड राज्य गठन के बाद भी जनता के खेवनहारों ने कृषि की इस अमूल्य निधि की तरफ आँख उठाकर देखने की जरूरत नहीं समझी। जिस प्रकार पहाड़ों की सोना उगलने वाली धरती को उपेक्षित कर बंजर में तब्दील किया जा रहा है, उससे तो लगता है कि एक दिन सिर्फ चट्टानें रह जाने के कारण पहाड़ों को ‘हाड़’ ही कहा जाने लगेगा।

मुनस्यारी में तीस-पैंतीस साल पहले तक 80 प्रतिशत लोग कृषि-बागवानी से जीवन निर्वाह करते थे। आलू की खेती सर्वाधिक रूप बर्नियागाँव में होती थी। भले ही आज भी यहाँ पर उत्पादन में कुछ कमी अवश्य आयी है, मगर यह गाँव मूलतः आलू के कारण ही जाना जाता है। ‘बर्नियागाँव का आलू और बिहार का लालू’ कह कर लोग हँसी-ठिठोली भी करते हैं। इसी तरह हरी सब्जियों के लिए हरकोट गाँव की अपनी ख्याति है। हरकोट की चोती (मूली) का जो स्वाद और आकार होता है, उसका मुकाबला शायद ही कहीं हो सके। राजमा की नकदी फसल का उत्पादन क्वीरीजिमिया, प्यांगती, बोना, तोमिक, गोरीपार, ढीलम आदि दूरस्थ गाँवों में बहुतायत से होता है, लेकिन उचित मूल्य न मिल पाने से काश्तकारों में नाराजी है, जिससे इसके उत्पादन में भी गिरावट आयी है।

कुछ ही जगहों पर, और पुराने ख्यालातों के लोग ही जमीनी मुहब्बत के कारण कृषि-बागवानी में लगाव लगाये हुए हैं। उनके बाद शायद ये बगीचे भी सूख जायें। करोड़ो की जमीन-जायदाद की बात होती तो दसों वारिस खड़े हो जाते, लेकिन इन सुन्दर बाग-उपवनों के लिए उत्तराधिकारी ढूंढे नहीं मिल रहे हैं। अब शायद हर किसी को तत्काल फल चाहिए, अखरोट की तरह 18 वर्ष के इन्तजार का धैर्य किसी को नहीं। उद्यमी राजेन्द्र सिंह कोरंगा बताते हैं कि एक समय ऐसा था जब मुनस्यारी के शास्त्री चौक में लोग 10-12 किमी. दूर बसन्तकोट, बीसा, दुम्मर, कव्वाधार, सेविला से पैदल चलकर केला, नारंगी, माल्टा, आड़ू, खुबानी, पुलम, नाशपाती, गन्ना आदि डोके में बोक कर दिन भर हर मौसम में यहाँ पर बिक्री कर अपने व अपने परिवार के लिए चाय, बीड़ी-तम्बाकू का खर्चा निकाल लेते थे। मदकोट के एक व्यक्ति ने तो नारंगी से इतना कमाया कि उसी के बलबूते एक मैक्स गाड़ी खरीद ली है और अब रोजाना पिथौरागढ़ से सवारियों को ढोने का अच्छा व्यवसाय चला रहा है, भले ही अब वह नारंगी बेचना भूल गया हो।

कृषि उद्यमियों की शिकायत है कि शासन और प्रशासन हमारी तरफ भूल कर भी नहीं देखते। न वन विभाग और न ही उद्यान विभाग उन्हें कोई प्रोत्साहन देते हैं। उद्यान विभाग से उन्हें कभी भी एक उन्नत प्रजाति का पौधा तक नहीं मिला। वन विभाग आज तक एक बन्दर को भगा पाने में भी सफल नही हो पाया। फसल लहलहाने से पूर्व से पकने तक इन वानरों का आतंक फैला रहता है। कभी-कभार वे छोटे बच्चों को चोट भी पहुँचा देते हैं। मुनस्यारी में मक्के की खेती में भी काफी गिरावट आयी है। भूमि की सर्वाधिक उर्वरा शाक्ति बढ़ाने वाली यह फसल आज सिर्फ छोटे से जमीन में सिमट कर रह गयी है। दूरस्थ गाँवों दूनामानी, आलम, दारमा, उच्छैती, वल्थी, जोशा में ही इसे आटे के रूप में बनाये जाने के लिए उत्पादन किया जा रहा है। जंगल जाकर निंगाल, जिससे डोका, तेता, डाला, राब्यों, म्वाल आदि का निर्माण किया जाता था, लाना भी आज नगण्य रह गया है। उद्यमी काश्तकार धरमु राम, जो पिछले 35 वर्षों से यह कार्य कर रहे हैं, बताते हैं कि कभी सरकार ने उन्हंे एक पैसे की सहायता तक नहीं दी। इसके बावजूद अपने पाँच बच्चों में से एक को वे यह शिल्पकला सिखाने की दिली तमन्ना रखते हैं। उन्हें आशा है कि उनका जगदीश उनकी इस पूँजी को अवश्य बचाये रखेगा। राजकीय इण्टर कालेज मुनस्यारी में दो दशक पूर्व मौन पालन की कक्षा चलती थी लेकिन कृषि मास्साब जितेन्द्र सिसौदिया के तबादले के बाद से यह कक्षा समाप्त हो गयी है। कुल मिलाकर राज्य गठन के बाद कृषि-बागवानी में गिरावट आयी है और राज्य सरकार इसके लिये पूरी तरह दोषी है।